दिवाली 2027दीपावली
दिवाली 2027 शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027 को है। धनतेरस (27 अक्टूबर 2027) से भाई दूज (31 अक्टूबर 2027) तक पूरा कैलेंडर, लक्ष्मी पूजा, कथा और पूजन विधि।
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दिवाली 2027: सभी तिथियां
| दिन | तिथि |
|---|---|
| धनतेरस | बुधवार, 27 अक्टूबर 2027 |
| काली चौदस, छोटी दिवाली (संध्या दीपदान) | बुधवार, 27 अक्टूबर 2027 |
| नरक चतुर्दशी (अभ्यंग स्नान, भोर) | गुरुवार, 28 अक्टूबर 2027 |
| दिवाली, लक्ष्मी पूजा | शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027 |
| गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) | शनिवार, 30 अक्टूबर 2027 |
| भाई दूज | रविवार, 31 अक्टूबर 2027 |
छोटी दिवाली काली चौदस की दीपदान संध्या है, जबकि नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान अगली भोर का है: एक ही चतुर्दशी तिथि के दो पर्व। तिथि देर तक चलने पर अभ्यंग स्नान स्वयं लक्ष्मी पूजा की भोर में पड़ सकता है, जैसा तालिका में है।
2027 में आपके देश में दिवाली
लक्ष्मी पूजा आपके अपने प्रदोष काल से होती है, इसलिए मुहूर्त और कभी-कभी तारीख भी नगर अनुसार बदलती है। नीचे हर पृष्ठ पर सत्यापित नगरवार समय हैं।
दिवाली की कथा
दिवाली दीपों का पर्व है, जो कार्तिक अमावस्या की सबसे अंधेरी रात को मनाया जाता है, जब हर घर दीपों की पंक्तियों से अंधकार का उत्तर देता है। इसकी सबसे प्राचीन कथा भगवान राम की है: चौदह वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के बाद सीता और लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटने पर नगरवासियों ने हर द्वार पर दीप जलाए, ताकि उनके राजा को नगर जगमगाता मिले। दिवाली की रात का हर दीया राम का स्वागत करती एक छोटी अयोध्या है।
इसी रात्रि क्षीरसागर मंथन से प्रकट माता लक्ष्मी का स्वागत स्वच्छ, दीपों से सजे घरों में गणेश सहित संध्या लक्ष्मी पूजा से होता है। अमावस्या से पूर्व की चतुर्दशी नरकासुर पर कृष्ण और सत्यभामा की विजय तथा सोलह हज़ार बंदियों की मुक्ति की है, जो रात्रि में काली चौदस के दीपदान और अगली भोर के अभ्यंग स्नान से स्मरण होती है। और अगले दिन श्रीकृष्ण ने व्रज की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था, जो अन्नकूट के भोग से पूजित होता है। पूरी कथाएं हिंदू कथा संग्रह में पढ़ें।
पांच दिनों का समापन भाई दूज से होता है, जब बहनें भाइयों की मंगलकामना करती हैं, जैसे यमुना ने यम के लिए की थी। अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, और हर बाहरी तम पर भीतर का दीपक: यही संपूर्ण दिवाली है।
दिवाली कैसे मनाई जाती है
| धनतेरस | द्वार स्वच्छ कर दीप जलाए जाते हैं, और लक्ष्मी एवं धन्वंतरि के लिए सोना, चांदी या नए बर्तन घर लाए जाते हैं। |
| लक्ष्मी पूजा | अमावस्या की संध्या को दीप, रंगोली, खील-बताशे और बहीखातों सहित लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है। |
| दीप और रंगोली | हर मुंडेर पर तेल के दीयों की पंक्तियां और द्वार पर रंगोली, जो रात भर जलती रहती हैं। |
| परिवार और प्रसाद | नए वस्त्र, पड़ोसियों में मिठाई, और सबसे पहले बड़ों का आशीर्वाद। |
उत्तर भारत में राम की कथा पर्व का केंद्र है; पश्चिम में व्यापारी लक्ष्मी के समक्ष नए बहीखाते खोलते हैं; बंगाल में यही रात्रि काली पूजा की है; और दक्षिण भारत में सूर्योदय से पूर्व तेल स्नान सहित नरक चतुर्दशी प्रमुख है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
2027 में दिवाली कब है?
दिवाली (लक्ष्मी पूजा) शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027 को है। पर्व के दिन 27 अक्टूबर 2027 के धनतेरस से 31 अक्टूबर 2027 के भाई दूज तक चलते हैं।
2027 में भारत के बाहर दिवाली की तारीख क्या है?
लक्ष्मी पूजा अमावस्या के स्थानीय प्रदोष काल से होती है, इसलिए संध्या और कभी-कभी तारीख भी नगर अनुसार बदलती है। 2027 के लिए सत्यापित: न्यूयॉर्क 28 अक्टूबर 2027 (06:48 PM to 08:36 PM); शिकागो 28 अक्टूबर 2027 (06:40 PM to 08:27 PM); लॉस एंजिल्स 28 अक्टूबर 2027 (07:00 PM to 08:41 PM); लंदन 28 अक्टूबर 2027 (06:19 PM to 07:57 PM); टोरंटो 28 अक्टूबर 2027 (07:02 PM to 08:48 PM); सिडनी 29 अक्टूबर 2027 (08:44 PM to 09:27 PM)।
2027 में छोटी दिवाली कब है?
छोटी दिवाली (काली चौदस दीपदान) बुधवार, 27 अक्टूबर 2027 की संध्या को है; नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान अगली भोर, 28 अक्टूबर 2027 को है।
लक्ष्मी पूजा रात में क्यों होती है?
लक्ष्मी पूजा अमावस्या के प्रदोष और निशिथ काल की है, जब दीप जलते हैं और मान्यता है कि देवी प्रकाशित, स्वागतमय घरों की ओर आती हैं। सटीक मुहूर्त आपके नगर पर निर्भर है: अपने स्थानीय समय के लिए दैनिक पंचांग देखें।
दिवाली हर वर्ष अलग तिथि पर क्यों पड़ती है?
दिवाली चंद्र पंचांग की कार्तिक अमावस्या से तय होती है, किसी स्थिर सौर तारीख से नहीं, इसलिए यह हर वर्ष अक्टूबर-नवंबर के बीच बदलती रहती है।
दिवाली की कथा क्या है?
रावण पर विजय के बाद भगवान राम का अयोध्या आगमन और दीपों से सजा नगर; क्षीरसागर से माता लक्ष्मी का प्राकट्य; और कृष्ण द्वारा नरकासुर का वध। तीनों कथाएं अंधकार पर प्रकाश की विजय हैं।
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तिथियां प्रामाणिक पंचांग स्रोतों (दृक पंचांग, नई दिल्ली) से सत्यापित हैं। परंपराएं परिवार और क्षेत्र अनुसार भिन्न होती हैं; मुहूर्त एवं पूजा विधि हेतु अपने पंडित जी से भी परामर्श करें।