छठ पूजा सामग्री सूची 2026: चारों दिन की पूरी तैयारी

छठ पूजा रविवार, 15 नवंबर 2026 को है। अपने शहर का मुहूर्त और समय देखें

छठ में चार दिन सूर्य देव और छठी मैया की उपासना होती है, और इसकी लगभग हर सामग्री सरल, ताज़ी और घर में बनी होती है: बांस का सूप और दउरा, अपने हाथों धोए और सुखाए गेहूं का ठेकुआ, और मौसम के फल व कंद।

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नहाय खाय और खरना

पहले दिन स्नान, घर की शुद्धि और कद्दू भात व चना दाल का एक सात्विक भोजन होता है। दूसरे दिन दिन भर के उपवास के बाद संध्या को गुड़ की खीर और रोटी से खरना होता है, और फिर लगभग छत्तीस घंटे का निर्जला व्रत आरंभ होता है। कई परिवार यहां से बनने वाले हर प्रसाद के लिए नया मिट्टी का चूल्हा और अलग बर्तन रखते हैं।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    नहाय खाय का कद्दू भात और खरना की गुड़ वाली खीर, दोनों अरवा चावल से ही बनते हैं, उसना चावल से नहीं।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    बिहार में लौकी को ही कद्दू कहते हैं, और चना दाल के साथ बनी यही सब्ज़ी भात के साथ नहाय खाय का सात्विक भोजन है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    चना दाल से नहाय खाय का भोजन पूरा होता है, और यह बिना प्याज़ लहसुन के सादे ढंग से बनती है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    कई परिवार अन्य व्रतों की तरह छठ के इन दिनों के भोजन में भी साधारण नमक की जगह सेंधा नमक डालते हैं।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    खरना की खीर, जिसे कई घरों में रसियाव कहते हैं, दूध में अरवा चावल और गुड़ पकाकर बनती है, और निर्जला व्रत से पहले का अंतिम भोजन यही है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    कई परिवारों में खरना का खीर रोटी वाला प्रसाद केले के ताज़े पत्ते पर अर्पित होता है, और व्रती उसी पर ग्रहण करते हैं।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    खरना की खीर और ठेकुआ परंपरा से नए मिट्टी के चूल्हे पर सूखी आम की लकड़ी जलाकर बनते हैं, जो रोज़ की रसोई से अलग रखा जाता है।

ठेकुआ और प्रसाद

ठेकुआ प्रायः संध्या अर्घ्य वाले दिन घर पर, साफ रसोई में बनता है, और अर्पण से पहले इसे कोई नहीं चखता। यही गेहूं, गुड़ और घी खरना की रोटी और खीर में भी लगते हैं, इसलिए इन्हें एक साथ ले लें।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    कई परिवार गेहूं धोकर, निगरानी में धूप में सुखाकर ताज़ा पिसवाते हैं, ताकि ठेकुआ का आटा शुरू से ही शुद्ध रहे।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    ठेकुआ और खरना की खीर, दोनों में परंपरा से गुड़ ही डलता है, और कई घर प्रसाद में चीनी नहीं डालते।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    घी ठेकुआ के आटे के मोयन में, उसे तलने में, खरना की रोटी पर और घाट के दीयों में काम आता है।

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    लकड़ी या धातु का सांचा हर ठेकुआ पर जाना पहचाना छापा उकेरता है और सबको एक समान रखता है, ताकि वे भीतर तक अच्छे से पकें।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    चावल के आटे और गुड़ से बने छोटे लड्डू, कसार, कई घरों में सूप में ठेकुआ के साथ रखे जाते हैं।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    कई घरों में ठेकुआ के आटे में कसा हुआ सूखा नारियल, सौंफ और इलायची स्वाद के लिए मिलाए जाते हैं।

सूप, दउरा और अर्घ्य

सूप में प्रसाद सजता है और दउरा में सूप रखकर घाट तक ले जाया जाता है, प्रायः परिवार के किसी पुरुष के सिर पर। घाट पर व्रती जल में खड़े होकर सूप सूर्य की ओर करते हैं और परिवार लोटे से दूध व जल का अर्घ्य देता है। अर्घ्य सूर्यास्त पर और फिर सूर्योदय पर दिया जाता है, इसलिए अपने शहर के अर्घ्य का समय हमारी छठ पूजा मार्गदर्शिका पर देखें।

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    बांस की फट्टियों से बना सूप प्रसाद के हर सेट को संभालता है, और अर्घ्य के समय इसी को सूर्य की ओर उठाया जाता है।

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    बांस की बड़ी टोकरी, दउरा, भरे हुए सूप, ठेकुआ और फल घाट तक ले जाती है और वापस भी लाती है।

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    अर्घ्य का दूध और जल इसी लोटे से सूप के ऊपर, सूर्य की ओर, अर्पित किया जाता है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    बिना उबाला गाय का दूध, जल के साथ, स्वयं अर्घ्य है, जो संध्या और उषा दोनों अर्घ्य में अर्पित होता है।

  • घर से

    नदी, तालाब या घर का स्वच्छ जल दूध के साथ अर्पित होता है, और कई परिवार इसमें गंगाजल की कुछ बूंदें मिलाते हैं।

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    घाट पर दउरा के पास और रात भर कोसी पर धूप जलाई जाती है।

सूप के फल और कंद

यही फल और कंद छठ के सूप को सबसे अलग बनाते हैं: पूरे, मौसमी और प्रायः सीधे खेत से, पत्ते और जड़ समेत। इन्हें एक दो दिन पहले स्थानीय बाज़ार से ताज़ा लें, धोकर छांव में रखें। हर सूप में क्या रखा जाए, यह परिवार की रीति और बाज़ार की उपलब्धता पर निर्भर करता है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    हरे पत्तों वाला पूरा गन्ना घाट पर दउरा के पास खड़ा किया जाता है, और कोसी के लिए गन्नों को बांधकर छत्र बनाया जाता है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    जटा समेत पूरा नारियल हर सूप में रखा जाता है और यह मुख्य अर्पणों में से एक है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    केले का पूरा घौद, प्रायः कच्चा और हरा, बिना तोड़े अर्पित होता है और उषा अर्घ्य के बाद प्रसाद में बंटता है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    मोटे छिलके वाला बड़ा नींबू, जिसे बिहार में गागल या बस नींबू कहते हैं, लगभग हर छठ सूप में रखा जाता है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    इस मौसम में तालाबों से आने वाला ताज़ा सिंघाड़ा छिलके समेत अर्पित किया जाता है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    इस मौसम में ताज़ी निकली शकरकंद बिना छीले, पूरी की पूरी अर्पित की जाती है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    सुथनी, रतालू परिवार का एक छोटा कंद जो प्रायः छठ के आसपास ही बिकता है, बिहार के कई परिवारों के सूप का अनिवार्य हिस्सा है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    कच्ची हल्दी पत्तों और जड़ समेत अर्पित की जाती है, नई फसल और शुभता के प्रतीक के रूप में।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    हल्दी की तरह अदरक भी कटी गांठ के रूप में नहीं, पूरे हरे पौधे के रूप में सूप में रखा जाता है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    पत्तों वाली मूली, सेब, संतरा, शरीफा, अनार, नाशपाती या आंवला, जो भी मौसम में मिले, सूप को भरा पूरा बनाते हैं।

दीये, सिंदूर और व्रती

दोनों अर्घ्य में घाट पर और रात को कोसी के चारों ओर दीये जलते हैं। व्रती नए, सादे वस्त्र पहनते हैं, और कई सुहागिन व्रती नाक से मांग तक लंबा नारंगी सिंदूर लगाती हैं।

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    हर अर्घ्य पर सूप में या दउरा के पास घी का दीया जलता है, और रात भर कोसी को भी दीये ही रोशन करते हैं।

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    कई सुहागिन व्रती नाक की नोक से मांग तक नारंगी सिंदूर लगाती हैं, और कई घरों में सूप पर भी सिंदूर का टीका लगाया जाता है।

  • स्थानीय बाज़ार से ताज़ा

    शुद्धता के प्रतीक रूप में व्रती अर्घ्य के लिए नए वस्त्र पहनते हैं, स्त्रियां प्रायः सादी सूती साड़ी और पुरुष धोती।

कोसी भराई, जिन परिवारों में होती है

जिन परिवारों ने छठी मैया से मन्नत मांगी हो या जिनकी मनोकामना पूरी हुई हो, वे संध्या अर्घ्य के बाद की रात आंगन या छत पर कोसी भरते हैं। गन्नों को, कई घरों में पांच, ऊपर से बांधकर छत्र बनाया जाता है, उसके नीचे मिट्टी की कोसी और हाथी को दीयों, ठेकुआ और फलों के साथ सजाया जाता है, और स्त्रियां चारों ओर छठ के गीत गाती हैं। कई परिवार उषा अर्घ्य से पहले घाट पर भी कोसी भरते हैं।

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    कोसी मिट्टी का वह कलश है जिसके चारों ओर कई छोटे दीपक बने होते हैं, और इसे जलाकर गन्नों के छत्र के बीच रखा जाता है।

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    मिट्टी का हाथी, जिसकी पीठ पर प्रायः छोटा कलश या दीये बने होते हैं, कोसी के साथ छत्र के नीचे रखा जाता है।

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    कई घरों में इसी कपड़े से गन्नों के ऊपरी सिरे बांधे जाते हैं और इसे कोसी के नीचे बिछाया जाता है।

इसमें न पुरोहित है न बड़ी वेदी, इसलिए अर्पण ही इस पूजा का हृदय है। यह सूची बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की रीति के अनुसार चारों दिन को क्रम से लेती है, नहाय खाय और खरना से लेकर संध्या और उषा अर्घ्य तथा कोसी भराई तक, और हर चीज़ के साथ बताती है कि कितनी चाहिए और क्यों। ताज़ी चीज़ें स्थानीय बाज़ार से लेने के लिए चिह्नित हैं, और केवल टिकाऊ सामान के साथ खरीदारी का लिंक दिया गया है।

छठ पूजा सामग्री सूची 2026: चारों दिन की पूरी तैयारी

तैयारी कैसे करें

  1. कुछ दिन पहले घर और रसोई की सफाई करें, नए या अलग बर्तन और मिट्टी का चूल्हा अलग रखें, और ठेकुआ के लिए गेहूं धोकर धूप में सुखा लें।
  2. नहाय खाय पर स्नान के बाद व्रती के एकमात्र भोजन के लिए घी में कद्दू भात और चना दाल बनाएं, परिवार की रीति हो तो सेंधा नमक के साथ।
  3. खरना पर संध्या को मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ की खीर और रोटी बनाएं, केले के पत्ते पर अर्पित करें, और पहले व्रती शांति से प्रसाद ग्रहण करें, फिर परिवार।
  4. संध्या अर्घ्य वाले दिन ठेकुआ और कसार ताज़ा बनाएं, और हर फल व कंद धो लें।
  5. हर सूप में ठेकुआ, कसार, नारियल, गागल, केला, सिंघाड़ा, शकरकंद, सुथनी, हल्दी और अदरक के पौधे तथा अन्य फल सजाएं, और घर की रीति हो तो सिंदूर का टीका लगाएं।
  6. सूपों को दउरा में रखकर साफ कपड़े से ढकें, और गन्ना, लोटा, दूध, दीये और धूप के साथ घाट ले जाएं।
  7. घाट पर दीये जलाएं; सूर्य ढलते समय व्रती जल में खड़े होकर हर सूप उठाते हैं और परिवार लोटे से दूध और जल का अर्घ्य देता है। अपने शहर के अर्घ्य का समय हमारी छठ पूजा मार्गदर्शिका पर देखें।
  8. परिवार में कोसी की परंपरा हो तो उसी रात गन्नों के छत्र तले कोसी भरें, फिर भोर से पहले दउरा लेकर उषा अर्घ्य और पारण के लिए घाट लौटें।

सुझाव

  • सूप, दउरा, लोटा, ठेकुआ सांचा और मिट्टी का हाथी एक दो सप्ताह पहले ले लें, क्योंकि अंतिम दिनों में घाट के पास के बाज़ारों में भीड़ और दाम दोनों बढ़ जाते हैं।
  • घर पर गेहूं धोना सुखाना संभव न हो तो गेहूं के ताज़े आटे का बंद पैकेट लें और उसे रोज़ के आटे से अलग रखें।
  • सुथनी, गागल, सिंघाड़ा और हल्दी के पौधे अंत में कम पड़ सकते हैं, इसलिए इन्हें एक दो दिन पहले लेकर छांव में गीले कपड़े से ढककर रखें।
  • नए मिट्टी के दीयों को कुछ घंटे पानी में भिगोकर सुखा लें ताकि वे कम घी सोखें, और माचिस तथा ढका हुआ दीपक साथ रखें, क्योंकि घाट पर हवा तेज़ रहती है।
  • प्लास्टिक और थर्मोकोल की जगह बांस, मिट्टी और कपड़े को चुनें, और जो भी ले जाएं वह वापस लाएं ताकि उषा अर्घ्य तक घाट साफ रहे।
  • व्रती के लिए सूखे कपड़े, शॉल और तौलिया तैयार रखें, क्योंकि संध्या और उषा दोनों अर्घ्य ठंडे पानी में खड़े होकर दिए जाते हैं।

क्षेत्रों के अनुसार

बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह सूची अपने सबसे पूरे रूप में दिखती है, और जिले जिले में छोटे अंतर मिलते हैं: कहीं कसार को लड़ुआ कहते हैं, खरना की खीर के अलग अलग नाम हैं, और सूप के फल वही होते हैं जो स्थानीय बाज़ार में मिलें। नेपाल का तराई क्षेत्र भी लगभग इसी दउरा और सूप के साथ छठ मनाता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और विदेशों में बसे परिवार मूल सामग्री रखते हुए जरूरत के अनुसार बदलाव करते हैं, पास में नदी न हो तो तालाब, पूल या घर पर बनाए स्वच्छ जल के कुंड में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं, और कुछ लोग बांस की जगह पीतल का सूप रखते हैं। कुछ घरों में मिट्टी के चूल्हे की जगह नए गैस चूल्हे और अलग बर्तनों में प्रसाद बनता है, और कोसी केवल वे परिवार भरते हैं जिनकी मन्नत हो। कुछ परिवार चैत्र मास में चैती छठ भी करते हैं, जिसमें उस मौसम के फलों के अनुसार मिलती जुलती सामग्री लगती है।

प्रश्न

छठ के सूप में क्या रखा जाता है?

ठेकुआ और कसार, पूरा नारियल, गागल, केले, सिंघाड़ा, शकरकंद, सुथनी, कच्ची हल्दी और अदरक के पौधे तथा अन्य मौसमी फल, साथ में एक दीया। गन्ना और केले का पूरा घौद सूप के भीतर नहीं, साथ में ले जाया जाता है।

छठ में कितने सूप चाहिए?

व्रती के लिए कम से कम एक। कई परिवार कई सूप ले जाते हैं, प्रायः हर संतान या परिवार के हर सदस्य के लिए एक, या जितने की मन्नत मानी हो, और इसकी कोई एक तय संख्या नहीं है।

छठ में कोसी भरना क्या है?

संध्या अर्घ्य के बाद की रात, मन्नत वाले परिवार गन्नों का छत्र बांधकर उसके नीचे जलती मिट्टी की कोसी और हाथी को ठेकुआ, फल और दीयों के साथ सजाते हैं और छठ के गीत गाते हैं। कई परिवार उषा अर्घ्य से पहले घाट पर भी कोसी भरते हैं।

छठ की कौन सी सामग्री ऑनलाइन मंगाई जा सकती है?

टिकाऊ चीज़ें आसानी से मंगाई जा सकती हैं: बांस का सूप और दउरा, पीतल या तांबे का लोटा, ठेकुआ सांचा, मिट्टी के दीये, नारंगी सिंदूर, धूप, और कोसी व मिट्टी का हाथी। गन्ना, फल, कंद, दूध और घी स्थानीय बाज़ार से ताज़ा लेना ही अच्छा है।

ठेकुआ किससे बनता है?

गेहूं का आटा, गुड़ और घी, प्रायः कसे सूखे नारियल, सौंफ या इलायची के साथ, लकड़ी के सांचे में दबाकर परंपरा से घी में तला जाता है। यह घर पर ताज़ा बनता है और अर्पण से पहले चखा नहीं जाता।

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