श्री हनुमान चालीसाअर्थ और भाव सहित
गोस्वामी तुलसीदास जी की चालीसा का हर दोहा और चौपाई, सरल अर्थ, भाव और चौपाई दर चौपाई वीडियो के साथ।
हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी में लिखी। 40 चौपाइयाँ हैं, इसलिए नाम चालीसा। शुरुआत में 2 दोहे हैं, और अंत में 1। यह हिंदू घरों में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली प्रार्थनाओं में से एक है, और कई परिवारों में बच्चे सबसे पहले इसी को कंठस्थ करते हैं।
नीचे हर दोहा और चौपाई, उसका सरल अर्थ और भाव दिया है। जिस चौपाई पर हमारा वीडियो है, वह उसके साथ चलता है। केवल पाठ करना हो तो “केवल पाठ” दबाइए, अर्थ छिप जाएँगे।
हनुमान चालीसा किसी भी दिन पढ़ी जा सकती है। मंगलवार और शनिवार हनुमान जी के दिन माने जाते हैं, और सुबह स्नान के बाद तथा संध्या दीपक के समय पाठ की परंपरा है। हनुमान जयंती पर, जो भारत में अगली बार मंगलवार, 20 अप्रैल 2027 को है, अनेक भक्त दिन भर बार-बार पाठ करते हैं।
आरंभ के दोहे
दोहा 1
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
अर्थ: गुरु के चरण-कमलों की धूल से, अपने मन के दर्पण को साफ़ करके, मैं श्री राम का निर्मल यश कहता हूँ, जो चारों फल देता है: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
भाव: तुलसीदास जी ने शुरुआत अपनी बड़ाई से नहीं, गुरु की धूल से की।

दोहा 2
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
अर्थ: अपने आप को बुद्धिहीन जानकर, मैं पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ। मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए, और मेरे दुख और विकार हर लीजिए।
भाव: ध्यान दीजिए, पहले अपनी कमी मानी, फिर माँगा।
40 चौपाइयाँ
चौपाई 1
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
अर्थ: हनुमान जी की जय, जो ज्ञान और गुणों के सागर हैं। वानरों के स्वामी की जय, जिनका प्रकाश तीनों लोकों में फैला है।
भाव: चालीसा की पहली चौपाई उन्हें बलवान नहीं, सबसे पहले ज्ञानी कहती है।

चौपाई 2
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
अर्थ: आप श्री राम के दूत हैं, अतुलनीय बल के धाम। माता अंजनि के पुत्र, और पवन देव के पुत्र, इन्हीं नामों से जाने जाते हैं।
भाव: राम दूत, यानी राम के संदेशवाहक। जब सीता जी की खोज में सब निकले, तो राम ने अपनी अँगूठी सिर्फ़ हनुमान जी को दी। उन्हें भरोसा था कि यही पहुँचेंगे।
चौपाई 3
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
अर्थ: आप महावीर हैं, पराक्रमी हैं, और बजरंगी हैं, यानी वज्र जैसे अंगों वाले। आप बुरी बुद्धि को दूर करते हैं, और अच्छी बुद्धि वालों के साथी हैं।
भाव: वज्र का शरीर, पर काम सोच सुधारने का।

चौपाई 4
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
अर्थ: सोने जैसा रंग, सुंदर वेश। कानों में कुंडल, और घुँघराले केश।
भाव: यह चौपाई हनुमान जी का दर्शन है, जैसे तुलसीदास जी उन्हें सामने देख रहे हों।
चौपाई 5
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
अर्थ: एक हाथ में वज्र, यानी गदा, और दूसरे में ध्वजा। कंधे पर मूँज घास का जनेऊ।
भाव: वज्र शक्ति का प्रतीक, ध्वजा विजय का, और जनेऊ मर्यादा का।
चौपाई 6
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बंदन॥
अर्थ: आप शंकर के अंश हैं, और वानरराज केसरी के पुत्र। आपके तेज और प्रताप की पूरा जगत वंदना करता है।
भाव: हनुमान जी को शिव का ग्यारहवाँ रुद्र अवतार माना जाता है।

चौपाई 7
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
अर्थ: आप विद्वान हैं, गुणवान हैं, अत्यंत चतुर हैं, और राम का काम करने को सदा आतुर रहते हैं।
भाव: तीनों शब्द बुद्धि के हैं, पर उस बुद्धि का उपयोग सेवा के लिए।
चौपाई 8
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
अर्थ: प्रभु की कथा सुनने के आप रसिया हैं, और आपके मन में राम, लक्ष्मण और सीता बसते हैं।
भाव: कहते हैं, जहाँ भी राम कथा होती है, हनुमान जी वहाँ सबसे पहले पहुँचते हैं।
चौपाई 9
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
अर्थ: आपने छोटा रूप धरकर अशोक वाटिका में सीता जी को दर्शन दिए, और राम की अँगूठी दी। और विकट, विशाल रूप धरकर लंका जला दी।
भाव: एक ही हनुमान, ज़रूरत के हिसाब से छोटे भी, और विशाल भी।
चौपाई 10
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥
अर्थ: आपने भीम, यानी भयंकर रूप धरकर असुरों का संहार किया, और श्री रामचंद्र जी के सारे काम सँवारे।
भाव: दसवीं चौपाई तक हनुमान जी का पूरा परिचय पूरा होता है: ज्ञान, रूप, शक्ति और सेवा।
चौपाई 11
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
अर्थ: आप संजीवनी बूटी लाए और लक्ष्मण जी को जीवित किया। श्री रघुवीर ने प्रसन्न होकर आपको हृदय से लगा लिया।
भाव: मेघनाद की शक्ति से लक्ष्मण जी मूर्छित हुए, तो हनुमान जी रात में ही हिमालय गए, और बूटी न पहचान पाने पर पूरा पर्वत ही उठा लाए।

चौपाई 12
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
अर्थ: श्री रघुपति ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा, तुम मुझे भाई भरत के समान प्रिय हो।
भाव: भरत, जिन्होंने चौदह वर्ष राम की पादुका सिंहासन पर रखकर राज चलाया, उन्हीं से राम ने हनुमान जी की तुलना की।
चौपाई 13
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
अर्थ: हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाते हैं, यह कहकर श्रीपति राम ने आपको गले लगा लिया।
चौपाई 14
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
अर्थ: सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवता, बड़े-बड़े मुनि, नारद, सरस्वती और शेषनाग,
भाव: चौपाई 14 और 15 मिलकर एक ही वाक्य हैं: पूरा ब्रह्मांड हनुमान जी का यश गाता है।
चौपाई 15
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
अर्थ: यमराज, कुबेर और सभी दिशाओं के रक्षक दिक्पाल भी आपका यश गाते हैं। जब वे भी उसे पूरा नहीं कह पाते, तो कवि और विद्वान कैसे कहें?
चौपाई 16
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
अर्थ: आपने सुग्रीव पर उपकार किया: उन्हें श्री राम से मिलाया, और राजपद दिलाया।
भाव: ऋष्यमूक पर्वत पर राम और लक्ष्मण से सबसे पहले हनुमान जी ही मिले, और दोनों को पीठ पर बिठाकर सुग्रीव के पास ले गए।
चौपाई 17
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
अर्थ: विभीषण ने आपकी सलाह मानी, और लंका के राजा बने, यह सारा संसार जानता है।
भाव: लंका में हनुमान जी को विभीषण राम नाम जपते मिले। वहीं से दोनों की मित्रता शुरू हुई।
चौपाई 18
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
अर्थ: हज़ारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने मीठा फल समझकर निगल लिया।
भाव: बचपन में हनुमान जी उगते सूर्य को पका फल समझकर उसकी ओर उछल पड़े थे।
चौपाई 19
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
अर्थ: प्रभु की अँगूठी मुँह में रखकर आप समुद्र लाँघ गए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
भाव: जो बचपन में सूर्य तक उछल गए, उनके लिए समुद्र लाँघना आश्चर्य की बात नहीं।
चौपाई 20
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
अर्थ: संसार के जितने भी कठिन काम हैं, आपकी कृपा से वे सब सरल हो जाते हैं।
चौपाई 21
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
अर्थ: आप श्री राम के द्वार के रखवाले हैं। आपकी आज्ञा के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
भाव: इसीलिए कहते हैं, राम तक पहुँचना हो तो पहले हनुमान जी के पास जाइए।
चौपाई 22
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना॥
अर्थ: जो आपकी शरण में आता है, उसे सब सुख मिलते हैं। जब आप रक्षक हों, तो किसी का डर नहीं।
चौपाई 23
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
अर्थ: अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं। आपकी एक हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।
चौपाई 24
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
अर्थ: जहाँ महावीर हनुमान का नाम लिया जाता है, वहाँ भूत-पिशाच पास नहीं आते।
भाव: इसीलिए डर लगने पर, ख़ासकर रात में, हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है।
चौपाई 25
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
अर्थ: जो वीर हनुमान का निरंतर जप करता है, उसके रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा दूर होती है।
चौपाई 26
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
अर्थ: जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे वे संकट से छुड़ाते हैं।
भाव: मन, कर्म और वचन, तीनों: केवल बोलकर किया गया स्मरण पूरा नहीं।
चौपाई 27
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
अर्थ: तपस्वी राजा श्री राम सबसे ऊपर हैं, और उनके सारे काम आपने ही सँवारे।
चौपाई 28
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
अर्थ: जो कोई भी अपनी कोई इच्छा लेकर आपके पास आता है, वह जीवन का असीम फल पाता है।
चौपाई 29
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
अर्थ: चारों युगों में आपका प्रताप है, और आपका प्रकाश सारे संसार में प्रसिद्ध है।
भाव: हनुमान जी चिरंजीवी माने जाते हैं। द्वापर युग में वे कुरुक्षेत्र में अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजे।
चौपाई 30
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अर्थ: आप साधु-संतों के रक्षक हैं, असुरों का नाश करने वाले हैं, और श्री राम के दुलारे हैं।
चौपाई 31
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
अर्थ: आप आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाले हैं। यह वरदान आपको माता जानकी ने दिया।
भाव: आठ सिद्धियों में अणिमा (सूक्ष्म होना) और महिमा (विशाल होना) भी हैं, जिन्हें चौपाई 9 में देखा।
चौपाई 32
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
अर्थ: आपके पास राम नाम रूपी रसायन है, और आप सदा श्री रघुपति के दास बने रहते हैं।
भाव: रसायन यानी अमृत जैसी औषधि। यहाँ राम नाम ही वह औषधि है।
चौपाई 33
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अर्थ: आपका भजन करने से श्री राम मिलते हैं, और जन्म-जन्म के दुख भूल जाते हैं।
चौपाई 34
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
अर्थ: अंत समय में वह श्री राम के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म ले, हरि का भक्त कहलाता है।
चौपाई 35
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
अर्थ: दूसरे देवताओं का ध्यान न भी करे, तो भी हनुमान जी की सेवा से सब सुख मिलते हैं।
चौपाई 36
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
अर्थ: जो बलवीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सारी पीड़ा मिट जाती है।
चौपाई 37
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
अर्थ: हे स्वामी हनुमान जी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। गुरुदेव की तरह मुझ पर कृपा कीजिए।
भाव: चालीसा गुरु से शुरू हुई थी, और यहाँ हनुमान जी से ही गुरु बनने की प्रार्थना है।
चौपाई 38
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
अर्थ: जो कोई इसका सौ बार पाठ करे, वह बंधनों से छूट जाता है और उसे महान सुख मिलता है।
भाव: इसीलिए कई भक्त सौ पाठ का संकल्प लेते हैं।
चौपाई 39
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
अर्थ: जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि मिलती है। इसके साक्षी स्वयं गौरीपति शिव हैं।
चौपाई 40
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
अर्थ: तुलसीदास सदा हरि के सेवक हैं। हे नाथ, मेरे हृदय में निवास कीजिए।
समापन दोहा
समापन दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ: हे पवनपुत्र, संकट हरने वाले, मंगल की मूर्ति, देवताओं में श्रेष्ठ, आप श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी सहित मेरे हृदय में बसिए।
भाव: चौपाई 8 में राम, लक्ष्मण और सीता हनुमान जी के मन में बसते थे; अंत में भक्त उन्हें अपने हृदय में माँगता है।
भक्ति आँगन से हनुमान जी पर और





अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हनुमान चालीसा किसने लिखी?
गोस्वामी तुलसीदास जी ने, जिन्होंने रामचरितमानस भी लिखा। यह अवधी में है, जो अयोध्या के आसपास की भाषा है।
इसका नाम चालीसा क्यों है?
चालीस यानी 40: इसमें 40 चौपाइयाँ हैं, उनसे पहले 2 दोहे और अंत में 1।
दोहा और चौपाई में क्या अंतर है?
दोहा दो पंक्तियों का छंद है, हर पंक्ति में तेरह और ग्यारह मात्राएँ, बीच में विराम। चौपाई में सोलह-सोलह मात्राओं के चार चरण होते हैं, जो यहाँ दो पंक्तियों में लिखे हैं।
हनुमान चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
किसी भी दिन। मंगलवार और शनिवार हनुमान जी के दिन माने जाते हैं, और सुबह स्नान के बाद तथा संध्या दीपक के समय पाठ की परंपरा है। भारत में अगली हनुमान जयंती मंगलवार, 20 अप्रैल 2027 को है।
क्या अर्थ जाने बिना पाठ कर सकते हैं?
हाँ। पाठ अपने आप में भक्ति है। अर्थ जानने से हर पंक्ति का भाव साथ रहता है, इसीलिए यह पेज हर चौपाई का अर्थ देता है।
हर सुबह एक दर्शन और एक मंत्र। भक्ति आँगन ऐप में जप की गिनती, दैनिक पंचांग और त्योहारों का कैलेंडर एक साथ।
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