मंत्र

गायत्री मंत्रअर्थ सहित

ऋग्वेद का वह मंत्र जो केवल एक चीज़ माँगता है: प्रकाश की ओर मुड़ी हुई बुद्धि।

सूर्योदय में मंदिरों से घिरे कमल सरोवर में विशाल कमल पर विराजमान चतुर्मुख भगवान ब्रह्मा, हाथों में वेद, माला और कमंडल

गायत्री मंत्र ऋग्वेद (3.62.10) का मंत्र है, जिसके द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र हैं। यह सविता देव को समर्पित है, वह दिव्य सूर्य जो सारे जीवन को गति देता है।

इसका नाम इसके छंद से है: गायत्री छंद, आठ-आठ अक्षरों की तीन पंक्तियाँ। पाठ में मंत्र से पहले ॐ और तीन व्याहृतियाँ, भूर्भुवः स्वः, बोली जाती हैं, जो पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग के नाम हैं।

सदियों तक यह उपनयन संस्कार में शिष्य को मिलने वाला पहला मंत्र रहा, और तभी से सूर्योदय और सूर्यास्त पर इसका जप होता आया है। आज यह घरों, विद्यालयों और मंदिरों में सब जगह जपा जाता है, और गायत्री माता के रूप में वेदों की माता के नाम से पूजा जाता है।

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

अर्थ: ॐ। पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग, तीनों लोकों में व्याप्त सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करे।

भाव: यह मंत्र धन या विजय नहीं माँगता। यह निर्मल बुद्धि माँगता है, इस भरोसे के साथ कि बाकी सब उसी से आता है।

गायत्री मंत्र: केवल रटना नहीं, समझना है
गायत्री मंत्र: केवल रटना नहीं, समझना है

शब्दशः अर्थ

शब्दअर्थ
ॐपरम ब्रह्म का पवित्र नाद
भूःपृथ्वी लोक
भुवःअंतरिक्ष लोक
स्वःस्वर्ग लोक
तत्उस
सवितुःसविता देव के, जो सबको जीवन और प्रेरणा देते हैं
वरेण्यम्श्रेष्ठ, वरण करने योग्य
भर्गःपापों को नष्ट करने वाला तेज
देवस्यदेव के
धीमहिहम ध्यान करते हैं
धियःबुद्धि को
यःजो
नःहमारी
प्रचोदयात्प्रेरित करें, सही मार्ग पर चलाएँ

जप कैसे और कब करें

सुबह पूर्व की ओर और शाम को उत्तर की ओर मुख करके बैठिए, हो सके तो स्नान के बाद, रीढ़ सीधी रखकर। परंपरा में तीन संध्याएँ इसका समय हैं: सूर्योदय, मध्याह्न और सूर्यास्त। इतना धीरे जपिए कि हर शब्द स्पष्ट हो, तीन, ग्यारह या एक सौ आठ बार, हर जप पर माला का एक मनका आगे करते हुए। जपते समय अर्थ मन में रखिए: यह मंत्र निर्मल बुद्धि माँगता है, तो बोलते समय मन भी निर्मल रहे।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गायत्री मंत्र किसने रचा?

ऋषि विश्वामित्र ने। यह ऋग्वेद का मंत्र 3.62.10 है, जो सविता देव को समर्पित है।

इसे गायत्री क्यों कहते हैं?

इसके छंद के कारण: गायत्री छंद में आठ-आठ अक्षरों की तीन पंक्तियाँ होती हैं। यह मंत्र वेदों की माता, गायत्री माता के रूप में भी पूजा जाता है।

ॐ भूर्भुवः स्वः का अर्थ क्या है?

ॐ परम ब्रह्म का नाद है; भूः, भुवः और स्वः पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग के नाम हैं। इन्हें मंत्र से पहले बोला जाता है, ताकि प्रार्थना हर लोक तक पहुँचे।

गायत्री मंत्र का जप कब करें?

संध्या के समय, यानी सूर्योदय, मध्याह्न और सूर्यास्त, परंपरागत समय हैं, और पढ़ाई से पहले भी। जब भी मन शांत हो, वही सही समय है।

इसका जप कितनी बार करें?

तीन, ग्यारह या एक सौ आठ बार, अंतिम एक पूरी माला है। जल्दी में किए गए अनेक जप से ध्यान से किए गए थोड़े जप बेहतर हैं।

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