आरती संग्रहअर्थ सहित सात प्रमुख आरतियाँ
हिंदू घरों में गाई जाने वाली सात प्रमुख आरतियाँ, अर्थ और गाने के समय के साथ।
आरती पूजा का प्रकाश में समापन है: परिवार गाता है और देवता के सामने घी या कपूर का दीपक घुमाया जाता है। यह शब्द संस्कृत के आरात्रिक से आया है, यानी भगवान के सामने घुमाया जाने वाला दीपक। ये वे सात आरतियाँ हैं जो अधिकतर घरों को कंठस्थ हैं, हर एक सरल अर्थ और गाने के दिनों के साथ। हर आरती की पहली पंक्तियाँ, यानी टेक, हर पद के बाद दोहराई जाती हैं।
आरती कैसे करें
- आरती की थाली में फूल, कुमकुम और अक्षत के साथ घी का दीपक या कपूर जलाइए।
- बाएँ हाथ से घंटी बजाते हुए दाएँ हाथ से दीपक घुमाइए, सदा घड़ी की सुई की दिशा में।
- एक प्रचलित परंपरा: चार बार चरणों में, दो बार नाभि पर, एक बार मुख पर, और फिर सात बार पूरे विग्रह के चारों ओर।
- जिस देवता की पूजा कर रहे हैं, उनकी आरती गाइए। अनेक घरों में पहले गणेश जी की आरती होती है और ॐ जय जगदीश हरे से पूजा पूरी होती है।
- अंत में कर्पूरगौरं और जयकारे बोलिए, फिर सबको आरती दीजिए: हर व्यक्ति लौ के ऊपर हाथ घुमाकर आँखों और माथे से लगाता है।
- फिर प्रसाद बाँटिए।
आरती के अंत में गाए जाने वाले कर्पूरगौरं के शब्द दैनिक श्लोक पेज पर हैं।

आरती 1 / 7 · गणेश
जय गणेश देवा
किसी भी पूजा में सबसे पहले, क्योंकि हर पूजा गणेश जी से आरंभ होती है। बुधवार और गणेश चतुर्थी पर भी।
टेक, हर पद के बाद दोहराएँ
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
एकदन्त दयावन्त चार भुजा धारी।
माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी॥
पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥
अंधे को आँख देत कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥
सूर श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा॥
अर्थ: पार्वती और महादेव के पुत्र गणेश जी की जय: एक दाँत वाले, दयालु, चार भुजाओं वाले, माथे पर तिलक और मूषक की सवारी। उन्हें पान, फल और मेवा चढ़ते हैं, लड्डुओं का भोग लगता है और संत उनकी सेवा करते हैं। वे अंधे को आँख, रोगी को काया, निःसंतान को संतान और निर्धन को धन देते हैं। अंतिम पंक्ति में सूरदास का नाम है, जो उनकी शरण में आकर अपनी सेवा सफल करने की प्रार्थना करते हैं।

आरती 2 / 7 · विष्णु
ॐ जय जगदीश हरे
अधिकतर पूजाओं के अंत में और सत्यनारायण कथा में, और अनेक घरों में संध्या आरती के रूप में।
टेक, हर पद के बाद दोहराएँ
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
तन मन धन सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥
अनेक घरों में यह पद अंत में जोड़ा जाता है: तन, मन, धन सब तुम्हारा है; तुम्हारा तुम्हें ही अर्पण।
अर्थ: जगत के स्वामी की जय, जो भक्तों के संकट क्षण में दूर करते हैं। जो उनका ध्यान करता है, उसके मन का दुख मिटता है, घर में सुख और संपत्ति आती है। तुम ही मेरे माता-पिता हो, पूर्ण परमात्मा, अंतर्यामी, करुणा के सागर और पालनहार; मैं तुम्हारा सेवक हूँ। तुम इंद्रियों से परे हो, सबके प्राणों के स्वामी: मैं अल्पबुद्धि तुम तक कैसे पहुँचूँ? दीनों के बंधु, दुख हरने वाले, करुणा का हाथ बढ़ाओ, मैं तुम्हारे द्वार पर पड़ा हूँ। विषयों के विकार और पाप मिटाओ, और श्रद्धा, भक्ति और संतों की सेवा बढ़ाओ।

आरती 3 / 7 · शिव
ॐ जय शिव ओंकारा
सोमवार, प्रदोष की संध्या, पूरे सावन और महाशिवरात्रि पर।
टेक, हर पद के बाद दोहराएँ
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
दो भुज चारु चतुर्भुज दसभुज से सोहे।
तीनों रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहे भाले शशिधारी॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे॥
कर में श्रेष्ठ कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता।
जगकर्ता जगहर्ता जग पालन कर्ता॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥
निर्गुण शिव की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥
अर्थ: ओंकार स्वरूप शिव की जय, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव समाए हैं और पार्वती जिनकी अर्द्धांगिनी हैं। वे एक मुख, चार मुख और पाँच मुख से शोभित हैं, हंस, गरुड़ और वृषभ पर विराजते हैं; दो, चार और दस भुजाओं वाले उनके तीनों रूप त्रिभुवन को मोहते हैं। वे रुद्राक्ष, वनमाला और मुण्डमाला, चंदन और कस्तूरी, और माथे पर चंद्रमा धारण करते हैं; श्वेत, पीत और बाघंबर वस्त्र पहनते हैं; सनकादि, ब्रह्मा और भूतगण उनके साथ हैं। कमण्डलु, चक्र और त्रिशूल धारण कर वे जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव को अलग अविवेकी ही मानते हैं: प्रणव ॐ में तीनों एक हैं। शिवानंद स्वामी कहते हैं, जो यह आरती गाता है, उसे मनचाहा फल मिलता है।

आरती 4 / 7 · श्रीकृष्ण
आरती कुंजबिहारी की
कृष्ण मंदिरों में हर संध्या, और सबसे बढ़कर जन्माष्टमी की आधी रात को।
टेक, हर पद के बाद दोहराएँ
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की॥
जहाँ ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की॥
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुँ दिसि गोपि ग्वाल धेनू, हँसत मृदु मंद, चाँदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की॥
अर्थ: कुंजों में विहार करने वाले, गिरिधारी श्रीकृष्ण मुरारी की आरती। गले में बैजंती माला, वे मधुर मुरली बजाते हैं; कानों में कुण्डल झलकते हैं, नंद के आनंद, नंदलाला। उनका अंग आकाश जैसा श्याम है और साथ में राधिका चमक रही हैं; लताओं में वनमाली खड़े हैं, भौंरों जैसी अलकें, कस्तूरी का तिलक और चंद्रमा जैसी झलक। सोने का मोर मुकुट शोभित है और देवता दर्शन को तरसते हैं; आकाश से फूल बरसते हैं, ग्वालिनों के संग मुरचंग और मृदंग बजते हैं। जिनके चरणों से गंगा प्रकट हुईं, जो कलियुग के पाप हरती हैं, जिनके स्मरण से मोह टूटता है और जो शिव की जटाओं में बसती हैं। यमुना तट की रेत चमक रही है, वृंदावन में बाँसुरी बज रही है, चारों ओर गोपियाँ, ग्वाले और गायें हैं; वे चाँदनी में मंद मुस्काते हैं और संसार के बंधन काटते हैं। हे प्रभु, दीन दुखियों की पुकार सुनिए।

आरती 5 / 7 · हनुमान
आरती कीजै हनुमान लला की
मंगलवार और शनिवार, हनुमान जयंती पर, और हनुमान चालीसा के पाठ के बाद।
टेक, हर पद के बाद दोहराएँ
आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरिवर काँपे, रोग दोष जाके निकट न झाँके।
अंजनि पुत्र महा बलदाई, संतन के प्रभु सदा सहाई॥
दे बीरा रघुनाथ पठाए, लंका जाय सिया सुधि लाए।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई, जात पवनसुत बार न लाई॥
लंका जारि असुर संहारे, सियारामजी के काज सँवारे।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे, आनि संजीवन प्रान उबारे॥
पैठि पताल तोरि जम कारे, अहिरावण की भुजा उखारे।
बाएँ भुजा असुरदल मारे, दाहिने भुजा संतजन तारे॥
सुर नर मुनि जन आरती उतारें, जय जय जय हनुमान उचारें।
कंचन थार कपूर लौ छाई, आरती करत अंजना माई॥
जो हनुमानजी की आरती गावै,
बसि बैकुंठ परम पद पावै॥
अर्थ: दुष्टों का दलन करने वाले, रघुनाथ की शक्ति, प्रिय हनुमान जी की आरती कीजिए। उनके बल से पर्वत काँपते हैं और रोग-दोष पास नहीं आते; अंजनि के पुत्र, महाबली, संतों के सदा सहायक। रघुनाथ ने बीड़ा देकर भेजा, तो वे लंका जाकर सीता जी की सुधि लाए; लंका का किला था और समुद्र उसकी खाई, फिर भी पवनसुत को देर नहीं लगी। लंका जलाकर असुरों का संहार किया और सीताराम जी के काज सँवारे; भोर में लक्ष्मण जी मूर्छित पड़े थे, तो संजीवनी लाकर उनके प्राण बचाए। पाताल में घुसकर यम के बंधन तोड़े और अहिरावण की भुजाएँ उखाड़ीं; बाईं भुजा से असुरों के दल मारे, दाहिनी से संतों को तारा। देवता, मनुष्य और मुनि आरती उतारते हैं और जय जय हनुमान का उच्चार करते हैं, और सोने के थाल में कपूर की लौ से स्वयं माता अंजना आरती करती हैं। जो हनुमान जी की आरती गाता है, वह बैकुंठ में वास कर परम पद पाता है।

आरती 6 / 7 · लक्ष्मी
ॐ जय लक्ष्मी माता
शुक्रवार, धनतेरस और दिवाली की रात लक्ष्मी पूजा में।
टेक, हर पद के बाद दोहराएँ
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता।
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता॥
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता।
कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनंद समाता, पाप उतर जाता॥
अर्थ: माता लक्ष्मी की जय, जिनकी सेवा शिव, विष्णु और ब्रह्मा दिन-रात करते हैं। तुम ही उमा, रमा और ब्रह्माणी हो, जगत की माता; सूर्य और चंद्रमा तुम्हारा ध्यान करते हैं और नारद ऋषि गुणगान करते हैं। निर्मल दुर्गा रूप में तुम सुख और संपत्ति देती हो, और जो तुम्हारा ध्यान करता है, वह ऋद्धि, सिद्धि और धन पाता है। तुम पाताल में भी वास करती हो, तुम ही शुभ देने वाली हो, कर्मों का फल प्रकट करती हो और भवसागर से पार लगाती हो। जिस घर में तुम रहती हो, वहाँ सब सद्गुण आते हैं, सब संभव हो जाता है और मन नहीं घबराता। तुम्हारे बिना न यज्ञ होते, न किसी को वस्त्र मिलते, और खान-पान का सारा वैभव तुमसे ही आता है। शुभ गुणों का सुंदर मंदिर, क्षीरसागर से जन्मी, तुम्हारे बिना चौदह रत्न कोई नहीं पाता। जो महालक्ष्मी जी की आरती गाता है, उसके हृदय में आनंद भर जाता है और पाप उतर जाते हैं।

आरती 7 / 7 · दुर्गा
जय अम्बे गौरी
नवरात्रि में, शुक्रवार को, दुर्गा अष्टमी पर और किसी भी देवी पूजा में।
टेक, हर पद के बाद दोहराएँ
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर नर मुनि जन सेवत, तिनके दुखहारी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥
शुंभ निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥
चण्ड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता॥
भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥
श्री अंबे जी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख संपति पावै॥
अर्थ: माँ अम्बे गौरी, श्यामा गौरी की जय, जिनका ध्यान विष्णु, ब्रह्मा और शिव दिन-रात करते हैं। माँग में सिंदूर और माथे पर कस्तूरी का टीका शोभित है; दोनों नेत्र उज्ज्वल हैं और मुख चंद्रमा जैसा सुंदर। सोने जैसा शरीर लाल वस्त्रों में दमकता है, गले में लाल फूलों की माला है। सिंह पर विराजती हैं, खड्ग और खप्पर धारण करती हैं, और सेवा करने वाले देवता, मनुष्य और मुनियों के दुख हरती हैं। कानों में कुण्डल और नाक में मोती शोभित है, करोड़ों चंद्र और सूर्य जैसी ज्योति है। उन्होंने शुंभ-निशुंभ को चीर डाला और महिषासुर का वध किया; धूम्रविलोचन, चण्ड, मुण्ड और रक्तबीज का संहार किया, मधु-कैटभ को मारकर देवताओं को निर्भय किया। वे ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला रानी हैं, शास्त्रों में वर्णित, शिव की पटरानी। चौंसठ योगिनियाँ मंगल गाती हैं, भैरव नाचते हैं, ताल, मृदंग और डमरू बजते हैं। वे जगत की माता और पालनहार हैं, भक्तों का दुख हरती हैं और सुख-संपत्ति देती हैं। चार भुजाओं वाली, वर मुद्रा धारण किए, वे सेवा करने वालों को मनचाहा फल देती हैं। सोने के थाल में अगर और कपूर की बाती करोड़ों रत्नों जैसी जगमगाती है। शिवानंद स्वामी कहते हैं, जो अम्बे माँ की यह आरती गाता है, वह सुख और संपत्ति पाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आरती क्यों की जाती है?
आरती पूजा का समापन प्रकाश से करती है। लौ पहले देवता को अर्पित होती है, फिर सबको दी जाती है, ताकि पूरा परिवार पूजा का आशीर्वाद पाए।
पहले कौन-सी आरती गाएँ?
अनेक घरों में पहले गणेश जी की आरती, फिर उस दिन के देवता की, और अंत में ॐ जय जगदीश हरे। परिवार की परंपरा ही तय करती है; कोई एक नियम नहीं है।
घर में आरती कब करें?
सुबह और शाम, पूजा के बाद। संध्या के समय दीपक जलाने पर होने वाली आरती वह है जिसे अधिकतर परिवार रोज़ करते हैं।
क्या पुरोहित के बिना आरती कर सकते हैं?
हाँ। आरती पूजा का वह भाग है जो सबके लिए है; घर में अक्सर बच्चे ही इसे करते हैं।
हर सुबह एक दर्शन। भक्ति आँगन ऐप में हर दिन नया दर्शन, जप गणक, पंचांग और हर त्योहार से पहले स्मरण।
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