गजेन्द्र मोक्ष

भगवान विष्णु · समर्पण की कथा

गजेन्द्र मोक्षGajendra Moksha

जब एक विशाल गजराज मगर के चंगुल में फँसकर भगवान को पुकारा, तब विष्णु उसे बचाने तुरंत आ पहुँचे।

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गजेन्द्र, गजों का स्वामी, एक बार स्नान हेतु एक सरोवर में उतरा, तभी एक शक्तिशाली मगर ने उसका पैर अपने जबड़ों में जकड़ लिया। वर्षों तक दोनों संघर्ष करते रहे, गजराज का अपार बल मगर की अटूट पकड़ के आगे धीरे-धीरे क्षीण होता गया।

जब अंततः उसका अपना बल चुक गया, तब गजेन्द्र समझ गया कि उसकी कोई शक्ति उसे नहीं बचा सकती। सूँड में एक कमल उठाकर, उसने पूर्णतः समर्पण कर उन भगवान विष्णु को पुकारा जो अपनी शरण में आए सबके रक्षक हैं।

गजेंद्र मोक्ष कथा, जब भगवान नंगे पाँव दौड़े
गजेंद्र मोक्ष कथा, जब भगवान नंगे पाँव दौड़े

तत्क्षण भगवान गरुड़ पर सवार होकर आए और अपने चक्र से गजराज को मुक्त कर मगर का वध किया। कहा जाता है कि वह मगर एक शापित दिव्य प्राणी था जो अंततः मुक्त हुआ, और गजेन्द्र को मुक्ति मिली, उसकी दीर्घ यातना भगवान के आलिंगन में समाप्त हुई।

कथा का सार

गजेन्द्र मोक्ष पूर्ण समर्पण की शक्ति सिखाता है। जब तक गजराज अपने बल पर निर्भर रहा, बँधा रहा; जिस क्षण उसने स्वयं को पूर्णतः भगवान को सौंपा, मुक्ति आ गई। यह यह आश्वासन है कि जब हर दूसरा सहारा विफल हो जाए, तब दिव्य को एक सच्ची पुकार कभी अनसुनी नहीं जाती।

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