18 में से अध्याय 1
अर्जुन का विषादअर्जुनविषादयोग
कुरुक्षेत्र के मैदान में दो विशाल सेनाएँ युद्ध के लिए आमने-सामने खड़ी हैं और दोनों ओर शंख बज उठते हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण से अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलने को कहते हैं, और सामने गुरुजनों, बड़ों और अपने ही स्वजनों को देखकर शोक से भर जाते हैं और धनुष रख देते हैं। यही वह मानवीय संकट है जिसका उत्तर पूरी गीता देती है।
47 श्लोक, संस्कृत, लिप्यंतरण और अर्थ सहित
धृतराष्ट्र बोले
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
dharma-kṣetre kuru-kṣetre samavetā yuyutsavaḥ,
māmakāḥ pāṇḍavāś caiva kim akurvata sañjaya.
हे संजय, धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे पुत्रों और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?
संजय बोले
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥
dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṁ vyūḍhaṁ duryodhanas tadā,
ācāryam upasaṅgamya rājā vacanam abravīt.
पांडवों की सेना को व्यूह में सजी देखकर राजा दुर्योधन ने अपने आचार्य द्रोण के पास जाकर यह बात कही।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥
paśyaitāṁ pāṇḍu-putrāṇām ācārya mahatīṁ camūm,
vyūḍhāṁ drupada-putreṇa tava śiṣyeṇa dhīmatā.
हे आचार्य, पांडु के पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र ने व्यूह में सजाया है।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥
atra śūrā maheṣvāsā bhīmārjuna-samā yudhi,
yuyudhāno virāṭaś ca drupadaś ca mahā-rathaḥ.
इस सेना में बड़े-बड़े धनुर्धर शूरवीर हैं, जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान हैं: युयुधान, विराट और महारथी द्रुपद।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥
dhṛṣṭaketuś cekitānaḥ kāśi-rājaś ca vīryavān,
purujit kuntibhojaś ca śaibyaś ca nara-puṅgavaḥ.
धृष्टकेतु, चेकितान, पराक्रमी काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और नरश्रेष्ठ शैब्य भी यहाँ हैं।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
yudhāmanyuś ca vikrānta uttamaujāś ca vīryavān,
saubhadro draupadeyāś ca sarva eva mahā-rathāḥ.
साहसी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्र भी हैं; ये सभी महारथी हैं।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥
asmākaṁ tu viśiṣṭā ye tān nibodha dvijottama,
nāyakā mama sainyasya saṁjñārthaṁ tān bravīmi te.
हे द्विजश्रेष्ठ, अब हमारे पक्ष के प्रमुख योद्धाओं को भी जान लीजिए। अपनी सेना के उन नायकों के नाम मैं आपकी जानकारी के लिए बताता हूँ।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥
bhavān bhīṣmaś ca karṇaś ca kṛpaś ca samitiñjayaḥ,
aśvatthāmā vikarṇaś ca saumadattis tathaiva ca.
आप स्वयं, भीष्म, कर्ण, युद्ध में सदा विजयी कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भी हमारे पक्ष में हैं।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥
anye ca bahavaḥ śūrā mad-arthe tyakta-jīvitāḥ,
nānā-śastra-praharaṇāḥ sarve yuddha-viśāradāḥ.
और भी बहुत से शूरवीर हैं जो मेरे लिए प्राण देने को तैयार हैं। वे तरह-तरह के शस्त्रों से सज्जित हैं और सभी युद्धकला में निपुण हैं।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥
aparyāptaṁ tad asmākaṁ balaṁ bhīṣmābhirakṣitam,
paryāptaṁ tv idam eteṣāṁ balaṁ bhīmābhirakṣitam.
भीष्म द्वारा रक्षित हमारी सेना अपार है, जबकि भीम द्वारा रक्षित इनकी सेना सीमित है।
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
ayaneṣu ca sarveṣu yathā-bhāgam avasthitāḥ,
bhīṣmam evābhirakṣantu bhavantaḥ sarva eva hi.
इसलिए आप सब व्यूह के हर मोर्चे पर अपने-अपने स्थान पर डटे रहकर, सब ओर से भीष्म की ही रक्षा करें।
तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥
tasya saṁjanayan harṣaṁ kuru-vṛddhaḥ pitāmahaḥ,
siṁha-nādaṁ vinadyoccaiḥ śaṅkhaṁ dadhmau pratāpavān.
तब दुर्योधन का उत्साह बढ़ाने के लिए कुरुवंश के वृद्ध, प्रतापी पितामह भीष्म ने सिंह के समान ऊँची गर्जना करके अपना शंख बजाया।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥
tataḥ śaṅkhāś ca bheryaś ca paṇavānaka-gomukhāḥ,
sahasaivābhyahanyanta sa śabdas tumulo ‘bhavat.
इसके बाद शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंघे एक साथ बज उठे। उनका स्वर बड़ा भयंकर था।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥
tataḥ śvetair hayair yukte mahati syandane sthitau,
mādhavaḥ pāṇḍavaś caiva divyau śaṅkhau pradadhmatuḥ.
तब सफ़ेद घोड़ों से जुते विशाल रथ पर खड़े माधव श्रीकृष्ण और पांडुपुत्र अर्जुन ने अपने दिव्य शंख बजाए।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥
pāñcajanyaṁ hṛṣīkeśo devadattaṁ dhanaṁjayaḥ,
pauṇḍraṁ dadhmau mahā-śaṅkhaṁ bhīma-karmā vṛkodaraḥ.
हृषीकेश श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य, धनंजय अर्जुन ने देवदत्त, और भयंकर कर्म करने वाले भीम ने पौण्ड्र नाम का महाशंख बजाया।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥
ananta-vijayaṁ rājā kuntī-putro yudhiṣṭhiraḥ,
nakulaḥ sahadevaś ca sughoṣa-maṇipuṣpakau.
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय, और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नाम के शंख बजाए।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥
kāśyaś ca parameṣvāsaḥ śikhaṇḍī ca mahā-rathaḥ,
dhṛṣṭadyumno virāṭaś ca sātyakiś cāparājitaḥ.
श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट और अजेय सात्यकि ने भी अपने शंख बजाए।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्॥
drupado draupadeyāś ca sarvaśaḥ pṛthivī-pate,
saubhadraś ca mahā-bāhuḥ śaṅkhān dadhmuḥ pṛthak pṛthak.
हे राजन्, द्रुपद, द्रौपदी के पुत्रों और महाबाहु सुभद्रापुत्र ने भी सब ओर से अलग-अलग अपने शंख बजाए।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥
sa ghoṣo dhārtarāṣṭrāṇāṁ hṛdayāni vyadārayat,
nabhaś ca pṛthivīṁ caiva tumulo vyanunādayan.
आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए उस भयंकर घोष ने धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय दहला दिए।
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥
atha vyavasthitān dṛṣṭvā dhārtarāṣṭrān kapi-dhvajaḥ,
pravṛtte śastra-saṁpāte dhanur udyamya pāṇḍavaḥ.
तब कपिध्वज अर्जुन ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध के लिए डटे हुए देखा। शस्त्र चलने ही वाले थे कि उन्होंने अपना धनुष उठा लिया।
अर्जुन बोले
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥
hṛṣīkeśaṁ tadā vākyam idam āha mahī-pate,
senayor ubhayor madhye rathaṁ sthāpaya me ‘cyuta.
हे राजन्, तब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यह वचन कहा: मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे॥
yāvad etān nirīkṣe ‘haṁ yoddhu-kāmān avasthitān,
kair mayā saha yoddhavyam asmin raṇa-samudyame.
रथ को वहाँ तब तक रखिए जब तक मैं युद्ध की इच्छा से डटे इन योद्धाओं को देख न लूँ, और जान न लूँ कि इस महासंग्राम में मुझे किन-किन से लड़ना है।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥
yotsyamānān avekṣe ‘haṁ ya ete ‘tra samāgatāḥ,
dhārtarāṣṭrasya durbuddher yuddhe priya-cikīrṣavaḥ.
मैं उन्हें देखना चाहता हूँ जो धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र को प्रसन्न करने की इच्छा से यहाँ युद्ध के लिए इकट्ठे हुए हैं।
संजय बोले
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥
evam ukto hṛṣīkeśo guḍākeśena bhārata,
senayor ubhayor madhye sthāpayitvā rathottamam.
हे भारत, अर्जुन के ऐसा कहने पर हृषीकेश श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कर दिया।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति॥
bhīṣma-droṇa-pramukhataḥ sarveṣāṁ ca mahīkṣitām,
uvāca pārtha paśyaitān samavetān kurūn iti.
भीष्म, द्रोण और सब राजाओं के सामने रथ खड़ा करके श्रीकृष्ण ने कहा: हे पार्थ, यहाँ इकट्ठे हुए इन कौरवों को देख।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
tatrāpaśyat sthitān pārthaḥ pitṝn atha pitāmahān,
ācāryān mātulān bhrātṝn putrān pautrān sakhīṁs tathā.
वहाँ अर्जुन ने सामने खड़े पितृजनों, पितामहों, आचार्यों, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को देखा।
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥
śvaśurān suhṛdaś caiva senayor ubhayor api,
tān samīkṣya sa kaunteyaḥ sarvān bandhūn avasthitān.
दोनों सेनाओं में उन्होंने ससुरों और हितैषी मित्रों को भी देखा। कुन्तीपुत्र अर्जुन ने वहाँ खड़े इन सब बंधु-बांधवों को ध्यान से देखा।
अर्जुन बोले
कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥
kṛpayā parayā ‘ ‘viṣṭo viṣīdann idam abravīt,
dṛṣṭvemaṁ sva-janaṁ kṛṣṇa yuyutsuṁ samupasthitam.
तब गहरी करुणा से भरकर और शोक में डूबकर अर्जुन बोले: हे कृष्ण, मैं देख रहा हूँ कि मेरे अपने ही स्वजन युद्ध की इच्छा से यहाँ खड़े हैं।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥
sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ ca pariśuṣyati,
vepathuś ca śarīre me roma-harṣaś ca jāyate.
मेरे अंग ढीले पड़ रहे हैं और मुँह सूखा जा रहा है। शरीर काँप रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥
gāṇḍīvaṁ sraṁsate hastāt tvak caiva paridahyate,
na ca śaknomy avasthātuṁ bhramatīva ca me manaḥ.
गांडीव धनुष मेरे हाथ से छूट रहा है और त्वचा जल रही है। मुझसे खड़ा भी नहीं रहा जाता, और मेरा मन मानो चकरा रहा है।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥
nimittāni ca paśyāmi viparītāni keśava,
na ca śreyo ‘nupaśyāmi hatvā sva-janam āhave.
हे केशव, मुझे अपशकुन दिखाई दे रहे हैं, और युद्ध में अपने ही स्वजनों को मारने में मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥
na kāṅkṣe vijayaṁ kṛṣṇa na ca rājyaṁ sukhāni ca,
kiṁ no rājyena govinda kiṁ bhogair jīvitena vā.
हे कृष्ण, मुझे न विजय चाहिए, न राज्य, न सुख। हमें ऐसे राज्य से, भोगों से या इस जीवन से भी क्या लेना?
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥
yeṣām arthe kāṅkṣitaṁ no rājyaṁ bhogāḥ sukhāni ca,
ta ime ‘vasthitā yuddhe prāṇāṁs tyaktvā dhanāni ca.
जिनके लिए हमने राज्य, भोग और सुख चाहे थे, वही लोग प्राणों और धन का मोह छोड़कर यहाँ युद्ध में खड़े हैं।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥
ācāryāḥ pitaraḥ putrās tathaiva ca pitāmahāḥ,
mātulāḥ śvaśurāḥ pautrāḥ śyālāḥ sambandhinas tathā.
ये गुरुजन, पितृजन, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले और दूसरे संबंधी हैं।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥
etān na hantum icchāmi ghnato ‘pi madhusūdana,
api trailokya-rājyasya hetoḥ kiṁ nu mahī-kṛte.
हे मधुसूदन, ये मुझे मार भी डालें, तब भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता; तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, फिर इस पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या।
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥
nihatya dhārtarāṣṭrān naḥ kā prītiḥ syāj janārdana,
pāpam evāśrayed asmān hatvaitān ātatāyinaḥ.
हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी? ये आततायी ही सही, इन्हें मारकर हमें पाप ही लगेगा।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
tasmān nārhā vayaṁ hantuṁ dhārtarāṣṭrān sva-bāndhavān,
sva-janaṁ hi kathaṁ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava.
इसलिए अपने ही बांधव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमें शोभा नहीं देता। हे माधव, अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥
yadyapy ete na paśyanti lobhopahata-cetasaḥ,
kula-kṣaya-kṛtaṁ doṣaṁ mitra-drohe ca pātakam.
लोभ ने इनकी बुद्धि ढक दी है, इसलिए इन्हें कुल के नाश में दोष और मित्रों से द्रोह में पाप नहीं दिखता।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥
kathaṁ na jñeyam asmābhiḥ pāpād asmān nivartitum,
kula-kṣaya-kṛtaṁ doṣaṁ prapaśyadbhir janārdana.
पर हे जनार्दन, हम तो कुल के नाश से होने वाले दोष को साफ़ देख रहे हैं; फिर हम इस पाप से पीछे हटना क्यों न जानें?
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥
kula-kṣaye praṇaśyanti kula-dharmāḥ sanātanāḥ,
dharme naṣṭe kulaṁ kṛtsnam adharmo ‘bhibhavaty uta.
कुल का नाश होने पर उसके सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, और धर्म के नष्ट होने पर पूरे कुल को अधर्म दबा लेता है।
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥
adharmābhibhavāt kṛṣṇa praduṣyanti kula-striyaḥ,
strīṣu duṣṭāsu vārṣṇeya jāyate varṇa-saṅkaraḥ.
हे कृष्ण, अधर्म के बढ़ जाने पर कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥
saṅkaro narakāyaiva kula-ghnānāṁ kulasya ca,
patanti pitaro hy eṣāṁ lupta-piṇḍodaka-kriyāḥ.
यह वर्णसंकर कुल का नाश करने वालों को और पूरे कुल को नरक में ले जाता है। पिंड और जल की क्रियाएँ लुप्त हो जाने से इनके पितर भी गिर जाते हैं।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥
doṣair etaiḥ kula-ghnānāṁ varṇa-saṅkara-kārakaiḥ,
utsādyante jāti-dharmāḥ kula-dharmāś ca śāśvatāḥ.
कुल का नाश करने वालों के इन वर्णसंकर पैदा करने वाले दोषों से जातिधर्म और सनातन कुलधर्म उखड़ जाते हैं।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥
utsanna-kula-dharmāṇāṁ manuṣyāṇāṁ janārdana,
narake ‘niyataṁ vāso bhavatīty anuśuśruma.
हे जनार्दन, हमने सुना है कि जिन मनुष्यों के कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन्हें अनिश्चित काल तक नरक में रहना पड़ता है।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥
aho bata mahat pāpaṁ kartuṁ vyavasitā vayam,
yad rājya-sukha-lobhena hantuṁ sva-janam udyatāḥ.
हाय, कितने दुःख की बात है कि हम बड़ा पाप करने पर तुले हैं, और राज्य के सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने चले हैं।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥
yadi mām apratīkāram aśastraṁ śastra-pāṇayaḥ,
dhārtarāṣṭrā raṇe hanyus tan me kṣemataraṁ bhavet.
यदि हाथों में शस्त्र लिए धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ निहत्थे और सामना न करने वाले को रण में मार डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
संजय बोले
एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥
evam uktvā ‘rjunaḥ saṁkhye rathopastha upāviśat,
visṛjya sa-śaraṁ cāpaṁ śoka-saṁvigna-mānasaḥ.
रणभूमि में ऐसा कहकर, शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन बाणों सहित धनुष को त्यागकर रथ में बैठ गए।
शांति, साहस या त्याग चुनें, और भक्ति आँगन ऐप दिन भर आपको उसी पर गीता का श्लोक भेजता है, साथ में पूरी गीता ऑफ़लाइन पढ़ने को।
संस्कृत पारंपरिक पाठ है, जिसे दो संस्करणों से मिलाया गया है। अर्थ हमारे अपने सरल भावानुवाद हैं, दैनिक चिंतन के लिए, विद्वत अनुवाद नहीं; गहन अध्ययन के लिए किसी प्रामाणिक टीका का भी संदर्भ लें।