
महाविद्या · दस में चतुर्थ
भुवनेश्वरीBhuvaneshwari
समस्त लोकों की स्वामिनी और जगजननी, जिनका शरीर ही ब्रह्मांड है।
ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमःभुवनेश्वरी की कथा
भुवनेश्वरी, चतुर्थ महाविद्या, भुवनों अर्थात समस्त लोकों की स्वामिनी हैं, वह जगजननी जिनका शरीर ही प्रकट ब्रह्मांड है। कोमल और तेजोमयी, वे पाश और अंकुश धारण करती हैं तथा वर और अभय प्रदान करती हैं।
वे असीम आकाश हैं, समस्त अस्तित्व का गर्भ, जिनमें लोक एक विशाल और तेजोमय आकाश में प्रतिबिंबों के समान प्रकट होते हैं।
अर्थ
भुवनेश्वरी सिखाती हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड माता का शरीर है, और समस्त आकाश उनकी स्नेहमय उपस्थिति से भरा है। वे वह विस्तार हैं जिसमें समस्त वस्तुएँ उदित होती हैं, विशाल, सर्वग्राही और मुक्त, और वे उस असीम चेतना की स्वतंत्रता प्रदान करती हैं।
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