भगवान शिव · भक्ति की कथा
मार्कण्डेयMarkandeya
सोलह वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त होने वाला बालक शिव से लिपट गया, और भगवान ने अपने भक्त के लिए स्वयं मृत्यु को जीत लिया।
मार्कण्डेय दुर्लभ भक्ति के बालक थे, दीर्घ प्रार्थना के पश्चात एक ऋषि और उनकी पत्नी के यहाँ जन्मे, किंतु उन्हें केवल सोलह वर्ष का जीवन मिला था। जैसे-जैसे उनका सोलहवाँ जन्मदिन निकट आया, उनके माता-पिता शोक से भर गए, और वह बालक अपना भाग्य जानकर पूर्णतः भगवान शिव की उपासना में लीन हो गया।
नियत दिन, मृत्यु के देवता यम अपना पाश लेकर उसे लेने आए। मार्कण्डेय शिवलिंग से लिपट गया, और जैसे ही यम ने पाश फेंका, वह बालक और लिंग दोनों के चारों ओर पड़ गया।
इस पर भगवान शिव क्रोध में लिंग से प्रकट हुए और अपने भक्त की रक्षा हेतु यम पर प्रहार किया। फिर भगवान ने मार्कण्डेय को सदा सोलह वर्ष का, एक अमर किशोर, रहने का वरदान दिया, और इसी कार्य में वे मृत्युंजय, मृत्यु के विजेता, के रूप में पूजे जाते हैं।
कथा का सार
मार्कण्डेय की कथा यह आश्वासन है कि सच्ची भक्ति मृत्यु को भी जीत सकती है। यह सिखाती है कि जो पूर्ण हृदय से भगवान की शरण लेता है वह कभी नहीं त्यागा जाता, और शिव, मृत्युंजय के रूप में, जीवन देने और अपने भक्तों को मृत्यु के भय से मुक्त करने की शक्ति रखते हैं।
भक्ति आँगन ऐप प्रतिदिन एक नया दर्शन, सरल मंत्र, जप गणक और पंचांग लेकर आता है, अब App Store पर उपलब्ध। Android पर हैं? प्रतीक्षा सूची में शामिल हों।
यह कथा आगे बढ़ाइए 🙏
कथा बाँटना भी सेवा है। जिसे आज इस आशीर्वाद की ज़रूरत है, उसे भेजिए।

