नीलकंठ

भगवान शिव · समुद्र मंथन

नीलकंठNeelkanth

जब समुद्र मंथन से ऐसा विष निकला जो समस्त सृष्टि का नाश कर सकता था, तब शिव ने संसार की रक्षा हेतु उसे पी लिया।

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जब देवताओं और असुरों ने अमृत पाने हेतु क्षीरसागर का मंथन किया, तब गहराइयों से सबसे पहले अमृत नहीं, अपितु हलाहल निकला, ऐसा भयंकर विष जिसकी लपटें मात्र से तीनों लोक झुलसने लगे। देवता और दैत्य दोनों भयभीत होकर भाग खड़े हुए, मानो सृष्टि ही समाप्त होने वाली हो।

नीलकंठ की कहानी, जहर पीने वाले देव
नीलकंठ की कहानी, जहर पीने वाले देव

अपनी निराशा में वे करुणामय भगवान शिव की शरण गए। शिव ने बिना क्षण गँवाए उस संसार-नाशक विष को अपनी अंजुली में समेटा और उसे पी लिया, ताकि प्रत्येक प्राणी की रक्षा हो।

जैसे ही विष उनके कंठ से उतरने लगा, देवी पार्वती ने उनका कंठ दबा दिया ताकि वह वहीं रुक जाए और न भगवान को न भीतर के लोकों को हानि पहुँचाए। हलाहल उनके कंठ में ठहर गया और उसे गहरा नीला कर गया, और उस दिन से शिव नीलकंठ, नीले कंठ वाले, के रूप में पूजे जाते हैं।

कथा का सार

नीलकंठ निःस्वार्थ त्याग का परम चित्र हैं: संसार का विष स्वयं में समेट लेने की तत्परता ताकि औरों का जीवन बचे। शिव सिखाते हैं कि सच्ची महानता अमृत छीनने में नहीं, अपितु सबके हेतु कड़वाहट सहने में है, और जो एक साधारण को नष्ट कर दे, उसे भगवान अपनी कृपा से धारण कर रूपांतरित कर देते हैं।

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