
विष्णु का द्वितीय अवतार · दशावतार
कूर्मKurma
अमृत की प्राप्ति हेतु पर्वत को धारण करने वाले ब्रह्मांडीय कच्छप।
ॐ कूर्माय नमःकूर्म की कथा
जब देवताओं ने अपना बल और वैभव खो दिया, तब उन्होंने क्षीरसागर की गहराइयों में छिपे अमृत को पाने का निश्चय किया। इसे प्राप्त करने के लिए देवता और असुर मिलकर मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर सागर मथने लगे।
किंतु मंथन करते समय वह पर्वत कोमल सागर-तल में धँसने लगा। भगवान विष्णु ने एक विशाल कच्छप, कूर्म, का रूप धारण किया और मंदराचल के नीचे जाकर उसका सम्पूर्ण भार अपनी पीठ पर उठा लिया, ताकि मंथन चलता रहे।
युगों तक वे मथते रहे, और सागर ने अपने रत्न प्रकट किए, और अंततः अमृत सतह पर आ गया। इस सारे प्रयास में वह धैर्यवान कच्छप अडिग रहा, वह स्थिर केंद्र जिस पर सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय प्रयास टिका था।
अर्थ
द्वितीय अवतार कूर्म प्रत्येक महान प्रयास की स्थिर नींव हैं। यह कथा सिखाती है कि सर्वोच्च लक्ष्य को भी एक धैर्यवान, अदृश्य आधार की आवश्यकता होती है, और भगवान भलाई की विजय हेतु संसार का भार उठाने को तत्पर रहते हैं। अपनी इंद्रियों को भीतर समेटे कच्छप वह ध्यानमग्न मन भी है जो संसार के मंथन में भी अविचल रहता है।
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