
शिव का रूप · मौन गुरु
दक्षिणामूर्तिDakshinamurti
शिव वह युवा गुरु जो परम ज्ञान मौन में प्रदान करते हैं।
ॐ दक्षिणामूर्तये नमःदक्षिणामूर्ति की कथा
दक्षिणामूर्ति के रूप में भगवान शिव एक शांत, युवा गुरु के रूप में एक विशाल वट वृक्ष के नीचे, दक्षिण दिशा की ओर मुख किए, विराजते हैं। उनके चारों ओर परम सत्य के खोजी वृद्ध ऋषि एकत्र होते हैं।
किंतु भगवान उन्हें शब्दों से नहीं, अपितु मौन में उपदेश देते हैं, उनका हाथ चिन्मुद्रा में उठा है, ज्ञान की मुद्रा। उस मौन में ऋषियों के संशय विलीन हो जाते हैं, और वे आत्मा का साक्षात अनुभव कर लेते हैं।
यह दुर्लभतम शिक्षा है: कि गहनतम सत्य को कहा नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है, और सच्चा ज्ञान गुरु की स्थिरता से शिष्य की तत्परता में उतरता है।
अर्थ
दक्षिणामूर्ति शिव आदि-गुरु हैं, प्रथम और परम शिक्षक, जो प्रकट करते हैं कि परम ज्ञान शब्दों से परे है। उनकी मौन शिक्षा साधक को भीतर की ओर मोड़ती है, उस आत्मा की ओर जो सदा उपस्थित है और जिसे केवल पहचानना शेष है। वे उन सबके संरक्षक हैं जो ज्ञान, योग और आत्मबोध की खोज में हैं।
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