देवी दुर्गा · वरदान और दैत्य
दुर्गा और महिषासुरDurga and Mahishasura
जब एक ऐसा दैत्य लोकों को त्रस्त करने लगा जिसे कोई देवता न हरा सका, तब देवताओं के सम्मिलित तेज से देवी दुर्गा प्रकट हुईं।
महिषासुर नामक भैंसा-दैत्य ने ऐसा वरदान पा लिया था कि उसे न कोई मनुष्य मार सके न देवता, और अपने अभिमान में उसने स्वर्ग जीत लिया तथा देवताओं को निकाल बाहर किया। स्वयं को अजेय मानकर उसने तीनों लोकों में आतंक फैला दिया।
देवता उसे परास्त न कर सके, तो उन्होंने अपना सम्मिलित तेज एक ही स्वरूप में उँडेल दिया, और उस ज्योतिपुंज से देवी दुर्गा प्रकट हुईं, योद्धा देवी, सिंह पर सवार और अपनी अनेक भुजाओं में समस्त देवताओं के शस्त्र धारण किए।
नौ दिन-रात तक देवी ने महिषासुर से युद्ध किया, जो बचने हेतु भैंसे से सिंह, फिर मनुष्य में बदलता रहा। अंततः, दसवें दिन, दुर्गा ने उसे दबाकर अपने त्रिशूल से उसका वध किया और स्वर्ग देवताओं को लौटा दिया। यह विजय नवरात्रि और विजयादशमी के रूप में मनाई जाती है।
कथा का सार
दुर्गा और महिषासुर की कथा अहंकार और बुराई पर दिव्य नारीशक्ति, शक्ति, की विजय है। यह सिखाती है कि कोई अत्याचार वस्तुतः अजेय नहीं, कि जब धर्म संकट में हो तो उसकी रक्षा हेतु एक महान शक्ति उठ खड़ी होती है, और कोमल माता ही वह उग्र रक्षिका भी हैं जो बुराई को टिकने नहीं देतीं।
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