भगवान शिव · वरदान और दैत्य
भस्मासुरBhasmasura
कैसे एक अविवेकी वरदान उसी दैत्य पर पलट गया जिसने उसे माँगा था, और विष्णु ने मोहिनी रूप में संसार की रक्षा की।
दैत्य भस्मासुर ने भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु दीर्घ और कठोर तपस्या की, और शिव तो अपने भक्तों की प्रार्थना पूर्ण करने में सदा तत्पर रहते हैं। जब शिव प्रकट हुए, तब दैत्य ने एक भयंकर वरदान माँगा: कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रखे वह तुरंत भस्म हो जाए। अपनी ही उदारता से बँधे शिव ने वह वरदान दे दिया।
शक्ति पाते ही भस्मासुर, मद में चूर, ने स्वयं शिव पर ही उसे आजमाने का निश्चय किया, ताकि वह भगवान का स्थान और उनकी अर्धांगिनी पार्वती को पा ले। शिव उस दैत्य के आगे भागे, जो अपना घातक हाथ फैलाए उनका पीछा लोकों भर करता रहा।
भगवान विष्णु ने संकट देखकर मोहिनी का रूप धारण किया, एक मनमोहक सुंदरी। भस्मासुर सब कुछ भूलकर उससे विवाह की याचना करने लगा। मोहिनी एक शर्त पर मानी: कि वह नृत्य में उसकी बराबरी करे। जैसे-जैसे दैत्य नाचा, उसकी हर मुद्रा की नकल करते हुए, मोहिनी ने अपना ही हाथ अपने सिर पर रखा, और भस्मासुर ने उसकी नकल में अपने सिर पर हाथ रखा, और उसी वरदान से तत्क्षण भस्म हो गया जिसे उसने माँगा था।
कथा का सार
भस्मासुर की कथा चेताती है कि विवेक रहित शक्ति उसी को नष्ट कर देती है जो उसे धारण करता है। लोभ में माँगा वरदान अभिशाप बन जाता है, और जो अहंकार कृतज्ञता भूलकर अपने ही दाता पर पलट जाए वह अपने विनाश का बीज साथ लिए चलता है। यह यह भी दर्शाती है कि दिव्य बल से नहीं, अपितु कृपा और चातुर्य से सदा धर्म की रक्षा का मार्ग खोज लेते हैं।
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