भगवान विष्णु · भक्ति की कथा
प्रह्लाद और नरसिंहPrahlad and Narasimha
एक दैत्यराज ने विष्णु की पूजा पर रोक लगाई, किंतु उसके अपने पुत्र की भक्ति ने भगवान को नरसिंह रूप में बुला लिया।
दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने ऐसा वरदान पा लिया था जिसने उसे लगभग अमर बना दिया, और उसने विष्णु की पूजा पर रोक लगाकर आदेश दिया कि सब केवल उसी को नमन करें। फिर भी उसका अपना युवा पुत्र प्रह्लाद भगवान का शुद्ध और निर्भय भक्त था, और कोई भय उसका हृदय न मोड़ सका।
क्रोधित होकर राजा ने बार-बार उस बालक को मारने का प्रयास किया, विष से, अग्नि से, गजों से कुचलवाकर और ऊँचाइयों से गिरवाकर, फिर भी हर बार प्रह्लाद अपनी अटल श्रद्धा से रक्षित होकर अक्षत निकला। अंततः राजा ने पूछा कि उसका विष्णु कहाँ है, और एक स्तंभ पर प्रहार कर पूछा कि क्या भगवान उसमें हैं।
स्तंभ फट पड़ा, और भगवान नरसिंह के रूप में प्रकट हुए, न मनुष्य न पशु। संध्या के समय, जो न दिन है न रात, देहरी पर, जो न भीतर है न बाहर, उन्होंने राजा को अपनी जंघा पर रखा, जो न धरती है न आकाश, और इस प्रकार वरदान तोड़े बिना अत्याचारी का अंत किया, फिर अपार प्रेम से बालक प्रह्लाद को आशीर्वाद देने मुड़े।
कथा का सार
प्रह्लाद की कथा सिखाती है कि जिसकी भगवान रक्षा करते हैं उसे धरती की कोई शक्ति हानि नहीं पहुँचा सकती, और भक्ति को न आयु चाहिए न बल, केवल सच्चाई। यह दर्शाती है कि दिव्य सर्वत्र उपस्थित हैं, एक स्तंभ के भीतर भी, और वे अपना वचन निभाने तथा अपने भक्त की रक्षा हेतु कोई भी रूप धारण कर लेंगे।
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